मूलाधार चक्र से लेकर सहस्रार चक्र तक ऊर्जा का सतत प्रवाह हो जाना ही कुंडलिनी जागरण है।
जब तक चक्र प्रकाशित नहीं होते तब तक कुंडलिनी उर्जा सही तरीके से अपने विराट स्वरूप को प्रदर्शित नहीं कर पाती।

मूलाधार चक्र
हमारे रीड के हड्डी के सबसे निचले हिस्से में गुदा और लिंग के बिच चार अंगुल विस्तार वाले कंद के रूप में स्थित सबसे पहला चक्र है उसे मूलाधार चक्र कहते है। कुंडलिनी का जागरण इसी चक्र के भेदन से आरंभ होता है।
सभी सात चक्र मूलाधार चक्र पर ही टिके होते हैं।
यह चार दलों वाले लाल (रक्तवर्ण) कमल के रूप वाला चक्र है। इन चार दलों पर चार अक्षर व, श, ष, स स्वर्णांकित है।
इसका तत्व बीज ‘लं’ है। यह पृथ्वी तत्त्व प्रधान है।
मूलाधार चक्र के जाग्रत होने के फायदे
- मूलाधार चक्र को साधने से आपकी सेहत में सुधार आता है।
- यह आपके हड्डी के लिए बहुत ही लाभदायक होता है।
- आप ध्वनि, स्पर्श, स्वाद, रूप व गंध जैसे पाच संवेदी तत्वों के प्रति गहन संवेदनशीलता विकसित कर लेते है।
मूलाधार चक्र जागृत होने के लक्षण
- आपको स्वस्थ रुप से कम भूख लगने लगती है।
- आहार की कम मात्रा ही आपके लिए पर्याप्त होती है क्योंकि आप भौतिक तत्वों का बेहतर अवशोषण करने लगते है।
- आप हर चीज का गहन अनुभव करने लगते है।
- आपके भीतर सभी जीवो के प्रति एक संवेदनशीलता विकसित होती है जो एक सच्चे आध्यात्मिक व्यक्ति की पहचान है।
