प्राणायाम

मूलाधार चक्र से लेकर  सहस्रार चक्र तक ऊर्जा का सतत प्रवाह हो जाना ही कुंडलिनी जागरण है।
जब तक चक्र प्रकाशित नहीं होते तब तक कुंडलिनी उर्जा सही तरीके से अपने विराट स्वरूप को प्रदर्शित नहीं कर पाती।

इडा नाडी (बायां नाक )के माध्यम से वायु को शनै- शनै अंदर की ओर खींचकर के उदर में धारण करें, उस पूरक काल में 16 मात्राओं का प्रयोग करें और श्रेष्ठ ओंकार  का ध्यान करें। तदंतर उदर में भरी हुई उस वायु को कुछ समय तक अंदर धारण किए रहें। उस समय 64 मात्राओं जितना समय लगाकर ओमकार का ध्यान करें।जब तक संभव हो सके तब तक जप में मन को एकाग्र करके वायु को रोककर रखें।तत्पश्चात विद्वान पुरुष 32 मात्राओं का समय लगाकर ओमकार के भाव सहित पिंगला नाड़ी( दांया नाक ) के माध्यम से सने सने धारण की हुई वायु को बाहर निकालें। कुछ समय बिना वायु के रहें, ओंकार का ध्यान करते रहें।
इस प्रकार से यह एक प्राणायाम हुआ । इसी भांति नित्य अभ्यास करते रहना चाहिए।

मात्रा  के संबंध में  अधिकांश साधक कुछ भी नहीं समझ पाते ,इसलिए यहां पर एक मात्रा का अर्थ आप सिर्फ 1 सेकंड समझिए। 16 मात्रा का अर्थ 16 सेकंड, 32 मात्रा का अर्थ 32 सेकंड और 64 मात्रा का अर्थ 64 सेकंड  समझिए।

इस तरह से प्रत्येक दिन प्राणायाम का अभ्यास निरंतर करते रहना चाहिए। इस प्रकार से प्रतिदिन अभ्यास करते रहने से साधक मात्र 6 मास में ही ज्ञान संपन्न हो जाता है।

एक वर्ष तक लगातार ऊपर कही हुई विधि से प्राणायाम करने से साधक को सत चित आनंद अविनाशी ब्रह्म का सत्य स्वरूप प्रकट होने लग जाता है। अतः प्राणायाम का नित्य ही अभ्यास किया जाना चाहिए। जो पुरुष योग के अभ्यास में संलग्न रह कर सदैव अपने कर्तव्य कर्म के पालन में लगा रहता है। वह पुरुष प्राणायाम के द्वारा ही सद ज्ञान रुपी प्रकाश को प्राप्त करके संसार सागर से मुक्त हो जाता है।

साधक का निष्कर्ष- योग विद्या में आठ अंग प्रमुख हैं- यम ,नियम आसन ,प्राणायाम ,प्रत्याहार ,धारणा, ध्यान, समाधि। अन्य सभी अंगों का अपना अपना महत्व है किंतु स्वास्थ्य की दृष्टि से, मानसिक दृष्टि से एवं आध्यात्मिक दृष्टि से सर्वाधिक महत्व प्राणायाम का है। यदि आप योग आसनों का अभ्यास नहीं भी करते हैं तो भी आप मात्र प्राणायाम के अभ्यास से ही पूर्ण स्वस्थ रह सकते हैं। हमारा प्राण ही समस्त शरीर में व्याप्त नाड़ियों को प्रभावित करता है। निरंतर सही तरीके से प्राणायाम करने पर, समस्त शरीर में व्याप्त नाड़ियां सही तरीके से काम करने लगती है, जिससे हमारी पाचन शक्ति, हृदय की प्रणाली एवं मस्तिष्क की कार्य प्रणाली सही तरीके से काम करने लगती है।

समस्त धर्मप्रेमी बंधुओं से निवेदन है — प्राणायाम का अधिक से अधिक अभ्यास  करें ! बिना प्राणायाम के अभ्यास के आप ध्यान भी नहीं लगा पाएंगे क्योंकि प्राणायाम से ही मन पर नियंत्रण होता है। आप जितना अधिक प्राणायाम का अभ्यास करेंगे। आपका मन उतना ही आपके वश में होता चला जाएगा अतः योग विद्या की महती आवश्यकता प्राणायाम है।