ध्यान

सर्वप्रथम कोई भी  साधक यदि वह आध्यात्मिक क्षेत्र में उन्नति प्राप्त करना चाहता है तो उसका ध्यान एकाग्र होना चाहिए।

यहां पर अधिकांश साधक जब योग साधना में आगे बढ़ते हैं तो सोचते हैं कि मूलाधार चक्र पर ध्यान लगाकर समस्त चक्रों को जागृत किया जाए किंतु कोई भी व्यक्ति यदि प्रारंभ में मूलाधार चक्र पर ध्यान लगाता है तो यहां पर ध्यान लगाना बहुत ही मुश्किल प्रक्रिया है। प्रारंभिक साधक का मूलाधार चक्र पर ध्यान लगाना बिल्कुल भी संभव नहीं हो सकेगा। इसलिए साधक को हमेशा आज्ञा चक्र पर ही ध्यान लगाना चाहिए।

ध्यान से पूर्व 5 से 10 मिनट नाड़ी शोधन अनुलोम विलोम प्राणायाम अवश्य करें। जब साधक का आज्ञा चक्र पर एकाग्रता पूर्वक ध्यान लगने लगे। प्रकाश का साक्षात्कार होने लगे। इसके पश्चात उसे चक्रों का भेदन करने के लिए ध्यान की ऊर्जा का प्रयोग करना चाहिए।
साधक को चक्रों का  भेदन करते हुए प्रारंभ में नाड़ी शोधन अनुलोम विलोम प्राणायाम कपालभाति प्राणायाम एवं भ्रामरी प्राणायाम का अवश्य अभ्यास करना चाहिए । जो साधक चक्रों का भेदन करना चाहता है उसका 1 आसन पर बैठने का अभ्यास एक से डेढ़ घंटे तक अवश्य हो जाना चाहिए।
साधक को आज्ञा चक्र पर 20 मिनट ध्यान करना चाहिए इसके पश्चात जब यहां पर ऊर्जा उत्पन्न हो जाए तो उस ऊर्जा को ध्यान के माध्यम से विशुद्धि चक्र पर लेकर जाएं अब विशुद्धि चक्र पर 15 मिनट तक ध्यान करें जब विशुद्धि चक्र पर उर्जा उत्पन्न  हो जाए इसके  पश्चात ध्यान के माध्यम से अनाहत चक्र पर ऊर्जा को लेकर जाएं। जब अनाहत चक्र में प्रकाश दिखाई देने लगे ऊर्जा का साक्षात्कार होने लगे इसके पश्चात मणिपुर चक्र में ध्यान की ऊर्जा को लेकर जाए। जब मणिपुर चक्र में प्रकाश उत्पन्न होने लगे ,प्रकाश दिखाई देने लगे ।इसके पश्चात ध्यान की ऊर्जा को स्वाधिष्ठान चक्र पर लेकर जाएं । जब स्वाधिष्ठान चक्र पर प्रकाश उत्पन्न होने लगे, ध्यान गहराई से लगने लगे इसके पश्चात मूलाधार चक्र पर ध्यान की ऊर्जा को लेकर जाएं । अब मूलाधार चक्र पर निरंतर ध्यान करते रहे। जब ध्यान समाप्त करना को तो क्रमशः मूलाधार से स्वाधिष्ठान, स्वाधिष्ठान से मणिपुर  से  अनाहत , अनाहत  से विशुद्धि चक्र एवं विशुद्धि से  आज्ञा चक्र पर ध्यान को लाकर ध्यान समाप्त करें ।जो साधक आज्ञा चक्र से नीचे की ओर चक्रों का भेदन करते हुए आया है वह जैसे ही मूलाधार चक्र पर ध्यान करेगा पूरी तरह से सहस्रार चक्र को प्रकाशित होता हुआ देख पाएगा।
आपको ऐसा लगेगा कि यह चक्र  भेदन का उल्टा  क्रम है किंतु मेरे अनुभव से यह सबसे सुरक्षित मार्ग है  क्योंकि जब व्यक्ति ऊपर से चक्रों का भेदन करते हुए मूलाधार चक्र तक पहुंचेगा तब तक उसका संपूर्ण शरीर ऊर्जा को सहन करने की पूर्ण योग्यता प्राप्त कर चुका होगा  और  ऐसी स्थिति में काम ऊर्जा को ऊपर भेजना किसी भी प्रकार से खतरे से पूर्ण नहीं है।

इस प्रकार से ध्यान करते हुए साधक जब मूलाधार एवं स्वाधिष्ठान चक्र पर एक से डेढ़ ,दो  घंटे तक ध्यान को बढ़ा देगा ,ऐसी स्थिति में उसकी संपूर्ण काम ऊर्जा वाष्प रूप धारण करके सहस्रार चक्र में पहुंच जाएगी  और  अत्यधिक प्रकाश का सृजन करेगी। ऐसी स्थिति में काम का केंद्र साधक के पूर्ण वशीभूत हो जायेगा ।यह कुंडलिनी महाशक्ति का संपूर्ण जागरण है।

इसके पश्चात जैसे-जैसे साधक अपनी साधना की ऊर्जा को  ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए आगे बढ़ाता है ,वैसे वैसे उसकी यह ऊर्जा अपना विस्तार प्राप्त करती जाती है। वास्तविक रूप में वीर्य को संरक्षित करने का महत्व ऊर्जा का  सहस्रार चक्र में प्रवाह होने के बाद ही सिद्ध होता है ।उससे पूर्व तक यदि कोई साधक वीर्य का संरक्षण करके अपने आप को शक्तिशाली एवं सिद्ध बनाना चाहे तो वह वीर्य  का संरक्षण किसी विशेष महत्व का नहीं ,किसी भी  काम का नहीं और यदि वीर्य को जबरदस्ती रोक कर रखा जाएगा तो वह विचारों को  उद्वेलित करता रहेगा।  इससे मन भटकेगा  और ध्यान में बाधा आएगी  और बिना ऊर्जा के ऊधर्व प्रवाह के कोई भी साधक  उसे रोक भी नहीं पाएगा ।हांँ यदि ऊर्जा का संपूर्ण प्रवाह सहस्रार  चक्र की ओर हो गया है तो साधक को  संभोग करने की कोई आवश्यकता महसूस नहीं होगी ।वह अपनी उर्जा को पूरी तरह से नियंत्रित कर सकता है।

जब ऊर्जा सहस्रार चक्र तक प्रवाहित होने लगे तो  उस साधक को बारी बारी से मूलाधार से लेकर सहस्रार चक्र तक ,चक्रों में ध्यान करते रहना चाहिए। जिससे की संपूर्ण चक्रों के क्षेत्र में आने वाली नाड़ियों को सहनशील ,दिव्य एवं ऊर्जावान बनाया जा सके। इस प्रकार से निरंतर साधना करता हुआ साधक अपने  संपूर्ण शरीर को ऊर्जा का दिव्य केंद्र बना सकता है।