स्वाधिष्ठान चक्र

मूलाधार चक्र से लेकर  सहस्रार चक्र तक ऊर्जा का सतत प्रवाह हो जाना ही कुंडलिनी जागरण है।
जब तक चक्र प्रकाशित नहीं होते तब तक कुंडलिनी उर्जा सही तरीके से अपने विराट स्वरूप को प्रदर्शित नहीं कर पाती।

स्वाधिष्ठान चक्र

यह चक्र लिंग के मूल में स्थित जल तत्व का केंद्र है। यह चक्र मूलाधार के ऊपर की तरफ है।  यह सिंदूर वर्ण के छः दलों वाला चक्र है।  इस चक्र पर सुक्ष्म ध्वनियां होती है जिनके बीज मंत्र बं, भं,म, यं, रं तथा लं है।  इस चक्र का तत्व जल है।   

स्वाधिष्ठान चक्र के जाग्रत होने के फायदे

  • इस चक्र पर ध्यान करने से रोग तथा भय मुक्त होते है।
  • मृत्यु का भय नहीं होता।
  • समान रूप से वायु प्रस्तुत होता रहता है तथा शरीर में निश्चित रूप से रस की वृद्धि होती है।
  • इस पर संयम करने से ब्रह्मचर्य पालन करने में बहुत सहायता मिलती है। काम ऊर्जा के उधर्वगामी होने में सबसे महत्वपूर्ण योगदान देता है।

स्वाधिष्ठान चक्र जागृत होने के लक्षण

  • काम ऊर्जा ऊपर की तरफ उठने लगाती है।
  • जीवन में अपार उत्साह का अनुभव होता है।