हिंदुत्व की आवश्यकता
भाइयों -बहनों !हम ऐसे धर्म के अनुयायी हैं जो पूर्णतया सत्य ,न्याय युक्त विचारधारा एवं विज्ञान पर टिका हुआ है किंतु वर्तमान समय में हमारा धर्म अपने वास्तविक वजूद से भटक गया है, सत्य से भटक गया है ।धर्म में विखंडनवादी तत्वों ने अत्यधिक स्थान पा लिया है। साथ ही जातिवाद रूपी महा भयानक दानव ने हमारी एकता एवं अखंडता को छिन्न-भिन्न कर दिया है । आये दिन इस जातिवाद की ज्वाला में संपूर्ण भारतवर्ष जलता रहता है। मां भारती का आंचल तार-तार किया जाता है। राष्ट्रीय संपत्ति को जलाया जाता है ,नष्ट किया जाता है ,लोगों को मारा जाता है ,काटा जाता है! आखिरकार हम भटक कर कहां चले गए हैं ?क्या हम सब मिलकर इस स्थिति से बाहर नहीं आ सकते ?क्या हम सब मिलकर इस परिस्थिति से लड़ने का संकल्प नहीं ले सकते जो हमारे वजूद के लिए ही खतरा बन गई है ?यदि हम जातिवादी कुंठाओं में घीरे रहे और ढोंग, पाखंड , आडंबर में लिपटकर हमेशा भटकते रहे तो निश्चित रुप से हमारा अस्तित्व दिनों दिन खतरे में पड़ता चला जाएग । राष्ट्र विरोधी एवं धर्म विरोधी शक्तियां मिलकर राष्ट्र एवं धर्म को नष्ट करने का भरसक प्रयास कर रही है । यदि हम सनातन के अनुयायियों को इस स्थिति से लड़ना है तो हम सबको मिलकर एक होना ही होगा। एकता एवं अखंडता के सूत्र में बंधना ही होगा । हमें आपस में स्नेह एवं प्रेम का सौहार्दपूर्ण वातावरण निर्मित करना होगा । आज भी यदि वास्तविक दृष्टिकोण में हम अपने आप को देखते हैं तो हम लकड़ियों का गट्ठर नहीं बल्कि जंगल में एक -एक बिखरी हुई लकड़ियां ही बने हुए हैं ।जिसे हर कोई आसानी से तोड़ने में समर्थ है। स्थितियां बहुत भयानक एवं विकराल दिखाई दे रही है। यदि इनसे लड़ना चाहते हो तो एकता एवं अखंडता के सूत्र में बंध कर राष्ट्रवादी एवं धर्म हित में कार्य कर रहे नेतृत्व के साथ उन महत्वपूर्ण पहलुओं पर दृढ़ता से काम करना शुरू कीजिए ।जिससे कि हम वास्तविक रूप में एकता एवं अखंडता का नया अध्याय शुरू कर सके।
भाइयों-बहनों !हमें अपने वास्तविक वजूद को पहचानने की आवश्यकता है। हम उस सत्य स्वरूप परमात्मा का साक्षात अंश है ।हम किसी जाति-पाति के मोहताज नहीं ।हमारी जाति मानव जाती है। उस सत्य स्वरुप परमात्मा ने हमें जाति में बांधकर ही भेजा है। वह जाति है” मानव जाति” ,किंतु मैं यहां पर सिर्फ और सिर्फ “हिंदुत्व “की बात करना चाहता हूँ। मैं चाहता हूं कि हम हिंदुओं का विखंडन समाप्त हो। हम एक ऐसे धर्म का निर्माण करें जिसमें सबको समानता के साथ जीवन जीने का अधिकार हो।
धर्मशास्त्र कहते हैं कि बड़े कल्याणकारी उद्देश्य के लिए छोटा लाभ त्याग दिया जाना चाहिए। हे मेरे आदरणीय ! गुरुजनों, माताओं ,बहनों ,भाइयों! आप को मेरा शत-शत प्रणाम!
मैं आप सबके समक्ष अपनी अंतर आत्मा से उपजे उनआत्मिक उद्गारों को अभिव्यक्त करना चाहता हूंँ जो सत्य से प्रेरित हैं,न्याय एवं धर्म से प्रेरित हैं ।जो भी सत्य धर्म का ज्ञान रखते हैं, उन बुद्धिजीवी संत महात्माओं, गुरुजनों ,भाई -बहनों से मेरा निवेदन है। इन तथ्यों पर गहनता से चिंतन मनन करें और दृढ़ संकल्पित होकर सनातन धर्म के अस्तित्व के लिए संपूर्ण हिंदू धर्म को एकजुट करने के लिए कृतसंकल्प हो जाएं। मेरे ये सुझाव तब तक कोई बड़ा परिवर्तन लाने में असमर्थ रहेंगे। जब तक आप सबका सहयोग एवं मार्गदर्शन नहीं मिलेगा। हम सब को स्वार्थवादी ,अहंकारवादी दृष्टिकोण छोड़कर सत्य की राह पर लौटना होगा ।तभी हम सत्य सनातन धर्म का अस्तित्व बचा पाएंगे।
एक बार फिर से आप सब को शत शत नमन !शत शत वंदन! शत शत प्रणाम!
हमें कार्य योजना बनाकर अमल में लाने हेतु संपूर्ण भारतवर्ष में अभियान चलाना चाहिए । एकता अखंडता एवं सत्य ,न्याय युक्त धर्म की पुनर्स्थापना के लिए।
आओ हम सभी संकल्पित हो जाएं ।मां भारती को उसका खोया हुआ गौरव पुनः लौटाएं ।
प्रथम आवश्यकता– सभी सनातन धर्म के अनुयायी अपने नाम के पीछे जाति, कुल ,गोत्र आदि लगाना छोड़ दे सिर्फ आर्य या हिंदू लगाएं।
दूसरी आवश्यकता– “अखंड हिंदू समाज “का गठन किया जाए जिसके तहत “धर्म प्रबंधन समिति” एवं “धर्म विकास समिति ” का गठन किया जाए। इस समिति का एक अकाउंट नंबर हो जिसमें विश्व के किसी भी देश से धर्मानुयायी दान कर सके। भारतवर्ष के संपूर्ण मंदिरों को धर्म प्रबंधन समिति के नियंत्रण में लाया जाए एवं इनमें चढ़ाए जाने वाले दान पर इस समिति का नियंत्रण हो।
आरंभ में मंदिरों को इस समिति के अंतर्गत लाना बहुत मुश्किल होगा इसलिए हम सिर्फ संगठन एवं समितियां बनाकर देशवासियों से आर्थिक सहयोग मांगकर अपने कार्य को आगे बढ़ा सकते हैं ।
तीसरी आवश्यकता– धर्म विकास समिति संपूर्ण भारतवर्ष के प्रत्येक गांव ,कस्बे ,वशहर के मोहल्ले- मोहल्ले में अपने आर्थिक कोष व जन सामान्य के सहयोग से भूमि का प्रबंधन करें। जहां पर साधना स्थली का निर्माण किया जाए या जिन मंदिरों में उचित स्थान उपलब्ध है वहां पर साधना करवाने हेतु उचित व्यवस्था की जाए । इन स्थलों में प्राथमिक स्तर पर प्रशिक्षित किसी व्यक्ति को नियमित रूप से साधना करवाने हेतु नियुक्त किया जाए या मंदिर के पुजारी जी को प्राथमिक योग साधना पद्धति में प्रशिक्षित करके उन्हें यह जिम्मेदारी सौंपी जाए। प्रत्येक मंदिर के गुंबद पर ध्वनि विस्तारक यंत्र लगाए जाएँ।
चौथी आवश्यकता– संपूर्ण विश्व में ग्राम स्तर पर ,पंचायत स्तर पर, ब्लॉक स्तर पर ,जिला स्तर पर ,राज्य स्तर पर, राष्ट्र स्तर पर एवं विश्व स्तर पर सनातन धर्म गुरु नियुक्त किए जाएं। धर्मगुरु किसी जाति के आधार पर नहीं बल्कि वेद विद्या के तत्व ज्ञान के आधार पर नियुक्त किए जाएं।
पांचवी आवश्यकता– समस्त सनातन धर्म अनुयायी सप्ताह में कम से कम एक बार रविवार के दिन ध्यान साधना के अभ्यास हेतु गर्मी में सुबह 5:00 बजे व सर्दियों में सुबह 7:00 बजे साधना हेतु साधना स्थली पर एकत्रित हो। जहां पर योग्य गुरु द्वारा धर्म अनुयायियों को वैदिक उपासना पद्धति का ज्ञान दिया जाए।
छठी आवश्यकता– धार्मिक आयोजनों हेतु धर्मावलंबियों की एक पोशाक निश्चित की जाय।
सातवीं आवश्यकता– समस्त हिंदुओं को गांव या शहर के किसी भी मंदिर में जाने से कोई नहीं रोके। यदि कोई ऐसा करता है तो धर्मगुरु के द्वारा उसके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई अमल में लाई जाए।
आठवीं आवश्यकता– समस्त धर्म गुरुओं को अपने अपने कार्य क्षेत्र के आधार पर धार्मिक आदेश जारी करने का अधिकार हो ।यदि कोई व्यक्ति धर्म संस्कृति एवं राष्ट्र का अपमान करता है तो धर्मगुरुओं के द्वारा उसके खिलाफ दंडित करने का धर्म सम्मत मान्य अधिकारपत्र हो। इस आदेश की पालना समस्त हिंदू मतावलंबियों द्वारा कठोरता से की जाए।
नवी आवश्यकता– समस्त मंदिरों के चढ़ावे व धर्म प्रबंधन समिति के बैंक खाते में प्राप्त राशि से धर्म के विकास हेतु संपूर्ण विश्व में विद्यालयों की स्थापना की जाए। इन विद्यालयों में छात्र छात्राओं के लिए आवासीय एवं गैर आवासीय दोनों प्रकार की अध्ययन व्यवस्था हो। छात्र छात्राओं को बचपन से ही अष्टांग योग के साथ-साथ, आत्मरक्षा हेतु जूडो कराटे ,अस्त्र-शस्त्र व आधुनिक विज्ञान सम्मत शिक्षा प्रणाली का ज्ञान दिया जाए।
दसवीं आवश्यकता– धर्म विकास समिति सनातन धर्म के प्रचार प्रसार हेतु विश्व के समस्त देशों में समय-समय पर योग शिविरों का आयोजन करें ।जिसमें लोगों को वेद ,उपनिषद षड्दर्शन का तत्व दर्शन समझाया जाए ।
ग्यारहवीं आवश्यकता– यह संपूर्ण सनातन धर्म अनुयायियों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण आवश्यकता है। वेद ,उपनिषद, षड्दर्शन एवं गीता के सत्य परक ज्ञान का अंतिम निचोड़ है यह। संपूर्ण सनातन धर्म के अनुयायी गायत्री महामंत्र एवं ओमकार (प्रणव) को ही गुरु मंत्र के रूप में स्वीकार करें ।वैदिक पद्धति के अनुसार गायत्री महामंत्र एवं ओंकार के द्वारा ही परब्रह्म की उपासना करने का आदेश है किंतु ओमकार एवं गायत्री महामंत्र से उपासना शुद्ध शाकाहारी व्यक्ति ही कर सकता है इसलिए जो मांसाहारी व्यक्ति हैं उन्हें मांसाहार से दूर किए बिना इस उपासना को नहीं किया जा सकता। जो व्यक्ति मांसाहार नहीं त्यागना चाहते किंतु साधना उपासना करना चाहते हैं । वे मां दुर्गा के नवार्ण मंत्र का जप कर सकते हैं। साथ ही श्वास पर आधारित आनापान ध्यान की विधि का अनुसरण भी कर सकते हैं। नवार्ण मंत्र तंत्र पद्धति पर आधारित है, इसलिए यहां पर शुद्ध सात्विकता का नियम लागू नहीं होता किंतु गायत्री महामंत्र एवं ओमकार के साथ शुद्ध सात्विक रहना अत्यंत आवश्यक है। प्रत्येक मनुष्य का अंतिम लक्ष्य जीवन मुक्त होना है और मांसाहार करते हुए व्यक्ति जीव हत्या के पाप से ग्रस्त होता है। इसलिए जिनका जीवन लक्ष्य मुक्त होना है ।उन्हें मांसाहार से दूर निश्चित रूप से हो जाना चाहिए और यदि लक्ष्य सिर्फ शक्ति प्राप्त करना है तो शक्ति तंत्र मार्ग से अधिक आसानी से प्राप्त होती है।
बारहवी आवश्यकता:- प्रत्येक मंदिर के पुजारियों को वैदिक योग पद्धति का ज्ञान दिया जाए। प्रत्येक मंदिर में सुबह शाम सनातन साधना पद्धति से धर्म अनुयायियों को साधना करवाई जाए। जब तक इस कार्य के लिए पुजारी जी तैयार नहीं हो जाते या सक्षम नहीं हो जाते तब तक किसी योग्य व्यक्ति को नियुक्त किया जाना चाहिए।
13वी आवश्यकता – प्रतिदिन शाम की संध्या उपासना के बाद या आरती के बाद प्रत्येक साधना स्थली एवं मंदिर में उपस्थित गुरुजनों या पुजारी जी के द्वारा वेद ,उपनिषद ,षड्दर्शन या गीता पर आधारित प्रवचन दिया जाए । काल्पनिक कहानियां नहीं सुनाई जाए जो कि धर्म अनुयायियों को सत्य से भटकाती है।
14वीं आवश्यकता– प्रत्येक मंदिर परिसर एवं साधना स्थली में यज्ञशाला का निर्माण किया जाए जहां पर नित्य हवन हो।
15वी आवश्यकता– जातिवाद के विष को हमेशा हमेशा के लिए समाप्त करने के लिए समान गुण कर्म के अलग-अलग जाति के लड़के लड़कियों में आपसी पारिवारिक सहमति से विवाह संबंध बनाए जाएँ।
16 वी आवश्यकता– गांव कस्बे शहर के प्रत्येक मंदिर में एक पुस्तकालय हो जिसमें वेद, उपनिषद ,षड्दर्शन, श्रीमद्भागवत गीता एवं सत्य आधारित ज्ञानी संत महात्माओं का साहित्य उपलब्ध हो।
17 वी आवश्यकता-“साहित्य संशोधन कमेटी” का गठन किया जाए। इस कमेटी में धर्म का मर्म समझने वाले तत्वदर्शी ज्ञानियों को सम्मिलित करके पुराणों में लिखी गई काल्पनिक एवं धर्म को बदनाम करने वाली संपूर्ण कहानियों को हटाकर संशोधित करके पुनः छापा जाए ।यदि किसी कहानी के माध्यम से किसी विषय वस्तु को समझाने का प्रयास किया गया है तो उसे ग्रंथ में स्पष्ट रूप से लिखा जाए। जिससे स्वाध्याय करते हुए जन सामान्य ग्रंथ के वास्तविक भावार्थ तक पहुंच सके।
प्रारंभिक स्तर पर इन सुझावों में से जो जो सुझाव आसानी से अमल में लाये जा सकें, उन पर विचार विमर्श करके आगे बढ़ना चाहिए । बाकी तर्कसम्मत बदलावों को बाद में धीरे-धीरे लागू किया जा सकता है ।
भाइयों-बहनों !ये सत्रह सुझाव हैं ,जिन्हें यदि हम सब स्वीकार कर ले तो निश्चित मान के चलिए सनातन धर्म को विश्व का सबसे शक्तिशाली , तर्कपूर्ण एवं वैज्ञानिक धर्म बनने से दुनिया की कोई ताकत रोक नहीं पाएगी। संपूर्ण विश्व सनातन धर्म की ओर खिंचा चला आएगा। पुनः भारत वर्ष में वैसे ही संत- महात्मा , ऋषि -मुनि ,योगी -तपस्वी ,महा योद्धा जन्म लेंगे जैसे सनातन काल में होते थे। हे मेरे धर्मानुयाई बंधुओं ! यदि हम चाहेंगे तो क्या असंभव है ?हम बदल गए तो युग को बदलने में समय ही कितना लगेगा? बस हमें वैदिक साधना पद्धति के साथ सत्य को अपनाना है। इसके पश्चात सत्य सनातन धर्म संसार का सबसे तर्कसम्मत धर्म बन जाएगा ।
यदि आपको मां आदिशक्ति की इस प्रेरणा में सनातन धर्म का उज्जवल भविष्य दिखाई देता है तो इन विचारों को जन-जन तक पहुंचा दीजिए ।प्रत्येक व्यक्ति तक पहुंचा दीजिए। इन विचारों को हर किसी माध्यम से इतना शेयर कीजिए कि ये विचार भारतवर्ष के प्रत्येक व्यक्ति तक पहुंच सकें, हर व्यक्ति तक पहुंच सकें।
आओ हम सत्य की राह चलें!
आओ हम वेदों की राह चलें !
आओ हम उपनिषदों की राह चलें!
आओ हम षढ दर्शन की राह चलें।
आओ हम गीता की राह चलेंं।
यही पूर्णतया सत्य की राह है ,बाकी सब भटकाव एवं छलावा है।
— रामेश्वर हिंदू
धर्म की जय हो ,अधर्म का नाश हो
सत्यमेव जयते
जय मां आदिशक्ति
