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कुंडलिनी जागरण का चक्र जागरण से क्या संबंध है?

क्या चक्रों का प्रकाशित होना ही कुण्डलिनी जागरण है या वो कोई और चीज है? 

अगर एक ही चीज नही है तो चक्रों के प्रकाशन का कुण्डलिनी जागरण से क्या संबंध है ?

मूलाधार चक्र से लेकर  सहस्रार चक्र तक ऊर्जा का सतत प्रवाह हो जाना ही कुंडलिनी जागरण है। जब तक चक्र प्रकाशित नहीं होते तब तक कुंडलिनी उर्जा सही तरीके से अपने विराट स्वरूप को प्रदर्शित नहीं कर पाती। यदि कोई साधक नियमित प्राणायाम का अभ्यास करते हुए आज्ञा चक्र पर ध्यान करता है तो प्राण का प्रवाह सुषुम्ना में होकर सहस्रार चक्र तक जाने लगता है किंतु जब तक वह नीचे के संपूर्ण चक्रों पर विशेष रूप से ध्यान नहीं करेगा तब तक संपूर्ण काम ऊर्जा का  उधर्व गमन नहीं किया जा सकता। मणिपुर चक्र ,स्वाधिष्ठान चक्र एवं मूलाधार चक्र इन तीनों चक्रों पर निरंतर ध्यान करने पर ही सेक्स एनर्जी  वाष्प रूप में रूपांतरित होकर सहस्रार चक्र में पहुंचती है । प्राण वायु का सहस्रार चक्र पर निर्बाध रूप से पहुंचना और इसके पश्चात संपूर्ण चक्रों को पूर्णरूपेण प्रकाशित कर देना ।साथ ही  काम ऊर्जा का वाष्प रूप में बदलकर सहस्रार चक्र में  प्रवेश कर जाना ।यही वास्तविक रूप में कुंडलिनी उर्जा का वास्तविक जागरण है। किसी साधक को आगे की कोई सिद्धि प्राप्त होगी या नहीं ।यह शरीर में उत्पन्न होने वाले प्रकाश के ऊपर ही निर्भर करता है ।जितना जितना प्रकाश का आवरण बढ़ता जाएगा ।साधक में सिद्धत्व  उतना ही बढ़ता जाएगा । इसलिए जिस साधक को साधना से उत्कृष्ट स्तर पर पहुंचना है ।उसे संपूर्ण चक्रों को ध्यान के द्वारा प्रकाशित करना चाहिए और किसी वास्तविक स्थान पर चक्रों की स्थिति के संबंध में ज्यादा चिंता करने की आवश्यकता भी  नहीं है । ऐसा नहीं है कि थोड़ा ऊपर नीचे हो गया तो कोई चिंता का विषय हो। आप अंदाजे से कहीं पर भी ध्यान कर सकते हैं ।चक्र कोई विशेष स्थान पर ही नहीं है । ध्यान के द्वारा  उस क्षेत्र में आने वाली ग्रंथियों पर प्रभाव डालने की विधि  ही चक्र जागरण है।  तंत्र मार्ग में 12 स्थानों पर ध्यान करने का विधान है ।इसलिए हम मूलाधार चक्र से लेकर सहस्रार चक्र तक कहीं पर भी ध्यान को लगा सकते हैं और जहां पर हम ध्यान लगाएंगे उसी क्षेत्र की नाडियां विशेष शक्तिशाली एवं क्रियाशील हो जाएंगी। चक्र जागरण का अर्थ है उस क्षेत्र में आने वाली संपूर्ण नाड़ियों में प्रकाश तत्व का ,प्राण तत्व का पूर्णरूपेण प्रकाशित हो जाना। जागृत हो जाना । यह उस चक्र क्षेत्र में आकाश तत्व की प्रधानता का द्योतक है ।स्थूल तत्वों के स्थान पर निर्वात स्थिति को उत्पन्न  कर देना। यही वास्तविक रूप में चक्र का प्रकाशित होना एवं पूर्ण जागरण है। यदि किसी  चक्र में पूर्णतया सूर्य के समान तेज प्रकाश का साक्षात्कार होने लगता है तो समझ लो कि वह चक्र जागृत हो चुका है।
– रामेश्वर हिंदू
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